
तुम मुझसे नफ़रत करते हो,
इसलिए मैं तुमसे नफ़रत करता हूँ,
इस तरह मैं तुम सा हो जाता हूँ,
लोग मोहब्बत में ही नहीं नफ़रत में भी करीब आते हैं,
जेहनों दिल में एक से हो जाते हैं,
वैसे मोहब्बत भी खूब कर के देखी,
उसमें नफ़रत सी गहराई नहीं, नशा नहीं,
कितनी भी सच्ची हो, लोग भुला देते हैं,
नफ़रत अगर सच्ची हो, तो पीढ़ी दर पीढ़ी निभाते हैं,
हाँ मुझे नफ़रत से मोहब्बत है,
अब मेरी नफ़रत मोहब्बत सी है,
और मोहब्बत नफ़रत सी,
तो मैं क्या करूं ,
मैं कोई अकेला तो नहीं,
मुझे आईना ना दिखाओ,
मेरे दुश्मन, मेरे अज़ीज़,
सच सच बताओ,
क्या तुम मेरे जैसे नहीं ?
क्या हम एक जैसे नहीं ?
क्या हम मोहब्बत में एक से हो पाते ?
क्या नफ़रत बेहतर नहीं ?
लोग पागल हैं,
हमारी नफ़रत को वहशत समझते हैं,
जाने दो नासमझ हैं,
हम मिल के नया इतिहास लिखेंगे,
मोहब्बत को नफ़रत के ख़िलाफ़ लिखेंगे,
हमारा किस्सा जो लोग सौ साल बाद सुनेंगे,
नफ़रत को मोहब्बत से पाक कहेंगे,
आओ इसी बात पे,
एक जाम हो जाए,
नफ़रत का जो नशा है उतरने नहीं पाए।
~रत्नाकर


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